Tuesday, April 9, 2019

नागरिकता की पहचान हिंदू या मुसलमान

लोअर असम के बाक्सा ज़िले के एक गांव का सूखता तालाब. इसी तालाब किनारे अपने घर के बाहर रूखे चेहरे के साथ माबिया बीबी बैठी हैं.

माबिया कहती हैं, 'पति अच्छा ख़ासा खा-पीकर घर से निकला.एनआरसी लिस्ट देखी तो अपना नाम नहीं मिला. उसे तभी दिल का दौरा पड़ा और वो वहीं मर गया.'

माबिया बीबी की ही तरह एक परिवार बिनय चंद्र का है.

पॉलिथीन से अपने बेटे की तस्वीर और काग़ज़ निकालती बिनय की मां. इन तस्वीरों के खींचे जाने और काग़ज़ों के इकट्ठा होने के बीच ही बिनयचंद्र ने दुनिया को अलविदा कह दिया.

बिनयचंद्र की बूढ़ी मां यही मानती हैं कि 'बिनयचंद्र की जान एनआरसी में नाम न आने से गई.'

कुछ महीने पहले नदी किनारे पेड़ से लटकी अपने बेटे की लाश को इस मां ने देखा था. अपनों को गंवा चुके परिवार चाहे कुछ भी कहें, प्रशासन इन 'मौतों के लिए एनआरसी को ज़िम्मेदार नहीं' मानता है.

ऐसे कई परिवारों की बातों पर यक़ीन करें तो असम में ये 'जानलेवा' काग़ज़ का टुकड़ा बेहद अहम है.

ये दो कहानियां प्रतीक भर नहीं हैं. ये अतीत में हुई उन क्रियाओं को दिखाती हैं, जिनकी प्रतिक्रियाएँ बीते 68 साल से लगातार असम को भोगनी पड़ रही हैं.

इस काग़ज़ के टुकड़े की अहमियत समझने के लिए हमें ऐसे अतीत में झांकना होगा, जिसमें हज़ारों लोगों का खून बहा है और लाखों लोग बेघर हुए हैं.

बंटवारे के बाद नेहरू-लियाकत पैक्ट के कारण पूर्वी पाकिस्तान और असम के बीच लोगों का आना-जाना जारी था.

साल 1951 में आरबी वघाईवाला के नेतृत्व में असम की जनगणना हुई. इसके आधार पर राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी तैयार हुआ.

इसमें मूल असमिया लोगों के अलावा वो भी थे,जो अंग्रेज़ों के चाय बागानों में काम करने बंगाल और दूसरे राज्यों से असम आकर बसे थे.

विरोध की आवाज़ें इस बसावट को लेकर भी सुनाई दीं. एनआरसी बनने के बाद इस विरोध ने बाहरी बनाम असमिया की शक्ल ली.

1951 की जनगणना में असम में मुस्लिमों की आबादी क़रीब 24 फ़ीसदी थी, तब असम के 80 लाख लोगों में से 45 लाख लोगों ने अपनी भाषा असमिया और 13 लाख लोगों ने बांग्ला को अपनी भाषा बताया.

एनआरसी के वक़्त आरबी वघाईवाला ने ये कहा था कि इसे अपडेट करना ज़रूरी होगा लेकिन ऐसा नहीं हो सका. कांग्रेस पर आरोप लगे कि वोटों की ख़ातिर एनआरसी का काम नहीं किया गया.

1971 में बांग्लादेश बनने तक शरणार्थियों का भारत आना जारी रहा. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भारत से लेकर अमरीका तक शरणार्थियों के मुद्दे पर तीखे सवालों का सामना करना पड़ा.

तब इंदिरा गांधी ने कहा था, ''पानी सिर के ऊपर से बह रहा है. हर धर्म के शरणार्थियों को लौटना होगा. इन शरणार्थियों को हम अपनी आबादी में नहीं मिलाएंगे.''

इस बयान का ज़मीन पर असर यूएनएचसीआर की इस रिपोर्ट से लगाइए. इसके मुताबिक़, हर रोज़ क़रीब दो लाख 10 हज़ार लोग सरहद पार कर बांग्लादेश लौट रहे थे. फरवरी 1972 तक ये संख्या 90 लाख पार कर गई.

हालांकि असम में बाहरियों को लेकर अब तक चली सबसे बड़ी लड़ाई अभी शुरू होनी बाकी थी.

साल 1979. बाहरियों को खदेड़ने की लड़ाई दो मोर्चे पर शुरू हुई. पहला मोर्चा ऑल असम स्टूडेंट यूनियन यानी आसू और ऑल असम गणसंग्राम परिषद का.

दूसरा मोर्चा सिवसागर के रंगघर से शुरू हुए यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम यानी उल्फ़ा का, जिसने आने वाले सालों में खूनी लड़ाई लड़ी. उल्फ़ा की प्रमुख मांगों के केंद्र में भी बाहरियों को खदेड़ना था.

1979 से शुरू हुआ असम आंदोलन आने वाले सालों में सैकड़ों लोगों की जान का दुश्मन बना. 1983 में असम के नेल्ली में हुए नरसंहार में सैकड़ों लोगों की जान गई.

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