बीजेपी ने अपने सहयोगी दलों को हमेशा दो स्वरूपों में देखा है - पहले, जो एनडीए के चुनावी आंकड़ों में इज़ाफा करते हैं और दूसरे, जो भारतीय राजनीति की मुख्य धुरी के रूप में उसकी पहचान मजबूत करते हैं.
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे हिन्दी बहुल क्षेत्रों में करारी हार के बाद हिन्दूवादी पार्टी के दृष्टिकोण में बड़े परिवर्तन हो रहे हैं.
एनडीए सहयोगियों के शब्दबाण तीखे हो चले हैं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को उनकी कड़वाहट झेलने को मजबूर होना पड़ा है.
मोदी और शाह, दोनों नए सिरे से गठबंधन का ताना-बाना बुनने में जुटे हैं, जो उनके पुराने तौर-तरीकों के लिए एक चुनौती से कम नहीं.
2014 के लोकसभा चुनाव में भारी बहुमत हासिल करने और उसके बाद कई विधानसभा चुनावों में लगातार जीत के बाद बीजेपी को महसूस होने लगा था कि पूरी राजनीति के केन्द्र में नरेंद्र मोदी को रखना ही काफी है और उनके लिए सहयोगियों की फुसफुसाहट कोई मायने नहीं रखती.
लेकिन मोदी और शाह को ये बात समझ में आ गई है कि बीजेपी के लिए अपने एनडीए सहयोगियों को खोना तुलनात्मक दृष्टि से ज़्यादा खराब है, बजाय इसके कि लोकसभा चुनाव के लिए अधिक सीटों की मांग करनेवाले दलों के सामने पूरी तरह असहाय हो जाना.
बीजेपी को चुनाव से पहले और चुनाव के बाद, दोनों ही स्थितियों में सहयोगियों की ज़रूरत है, क्योंकि आत्मविश्वास से लबरेज़ राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष प्रदेश स्तर पर विशिष्ट गठबंधन तैयार करने की कोशिश कर रहा है.
अमित शाह अब भी मान रहे हैं कि शिवसेना एनडीए का सहयोगी है और बीजेपी उसके साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ेगी, जबकि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे स्पष्ट कर चुके हैं कि वो अकेले बूते पर चुनावी जंग लड़ेंगे.
इसी प्रकार बीजेपी को राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) की भारी-भरकम मांग मानने से भी परहेज नहीं, जबकि हक़ीक़त के धरातल पर पार्टी के प्रभाव और नेताओं के दावों में ज़मीन-आसमान का अंतर है.
मौजूदा हालात में बीजेपी के लिए मोदी की आलोचक शिवसेना को गठबंधन से दूर जाने देना मुमकिन नहीं दिखता क्योंकि एन चन्द्रबाबू नायडू की टीडीपी और उपेन्द्र कुशवाहा पहले ही गठबंधन से किनारा कर चुके हैं.
इसी प्रकार अगर पासवान और उनके बेटे को एनडीए से नाता तोड़ना पड़ता तो ये राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के लिए भारी क्षति होती.
लिहाज़ा बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जनता दल (यूनाइटेड) के साथ बराबरी के आधार पर सीटों का समझौता करने वाली बीजेपी के लिए एलजेपी की मांगों के सामने झुकना मजबूरी है.
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